• net power | |
शुद्ध: purdah sheer filet net amount of risk net annual | |
शक्ति: Sakti muscle vigor Energy potence zip stamina | |
शुद्ध शक्ति अंग्रेज़ी में
[ shudha shakti ]
शुद्ध शक्ति उदाहरण वाक्य
उदाहरण वाक्य
अधिक: आगे- हालां कि नरेश मेहता कहते थे कि ‘ कविता की कोई संज्ञा नहीं है, क्यों कि वह तो शुद्ध शक्ति है।
- साधारण बैक्टेरिया तो ३ अरब वर्षों से इस स्टेज पर आ चुका था, जो प्राचीन हिन्दू के अनुसार उत्पत्ति कर मानव रूप पाया है (अर्थात शुद्ध शक्ति से आरम्भ कर ८४ लाख रूप धर मानव का इस धरती पर पदार्पण हुवा...
- साधारण बैक्टेरिया तो ३ अरब वर्षों से इस स्टेज पर आ चुका था, जो प्राचीन हिन्दू के अनुसार उत्पत्ति कर मानव रूप पाया है (अर्थात शुद्ध शक्ति से आरम्भ कर ८ ४ लाख रूप धर मानव का इस धरती पर पदार्पण हुवा...
- जो मुझे समझ आया, योगेश्वर विष्णु / शिव, परम ज्ञानी निराकार जीव, अर्थात शुद्ध शक्ति रूप को (८ x ८ =) ६ ४ योगिनियों से बना हुआ जाना प्राचीन सिद्धों ने जो शून्य विचार तक तपस्या द्वारा पहुँच पाए...
- असली विकास तो सर्व प्रथम शुद्ध शक्ति से साकार संसार का बनाया जाना है, और उस को अरबों साल से बनाये रखना-अनंत काल तक-जिससे ' आप ' और ' हम ' भी अधकतर भय के साथ साथ थोडा बहुत आनंद की अनुभूति कर तनिक लाभ उठा सकें इस निरंतर परिवर्तन शील ' मायावी जगत ' में-कुछ पल के लिए ही सही...
- और हिन्दू मान्यतानुसार शुद्ध शक्ति से आरम्भ कर उत्पति के पश्चात, ८ ४ लाख प्राणी रूपों से गुजरने के बाद, मानव रूप मिलता है, परम शक्ति का प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब! किन्तु, हर कोई खिसिया कर दूसरे में किसी ' निम्न श्रेणी ' के प्राणी की झलक ही देखता है, परम शक्ति का नहीं, जो कुछ बिरले ही देख पाते हैं जिनकी ' ई एस पी ' जगी होती है...
- असली विकास तो सर्व प्रथम शुद्ध शक्ति से साकार संसार का बनाया जाना है, और उस को अरबों साल से बनाये रखना-अनंत काल तक-जिससे 'आप' और 'हम' भी अधकतर भय के साथ साथ थोडा बहुत आनंद की अनुभूति कर तनिक लाभ उठा सकें इस निरंतर परिवर्तन शील 'मायावी जगत' में-कुछ पल के लिए ही सही... “सत्यम शिवम् सुन्दरम”, और “सत्यमेव जयते”, आदि अनंत शिव पर बिचारणीय कुछेक देसी कहावतें भी हैं...:)
- और हमारी गैलेक्सी की उत्पत्ति (शुद्ध शक्ति का कलियुग अथवा अन्धकारमय शून्य से आरम्भ कर), क्षीरसागर मंथन की कथा द्वारा सतयुग के अंत तक देवताओं का यानि हमारे सौर-मंडल के सदस्यों का भी चार चरणों में ' अमृत ' पाना, उन्ही में से एक सदस्य चन्द्रमा (जो पृथ्वी से ही उत्पन्न हुई और हिमालय पुत्री पार्वती कहलाई, यानि चतुर्भुज अनंत शिव / विष्णु का ही मोहिनी रूप) द्वारा ' सोमरस ' प्रदान कर:)